गोचर: चटवापीपल में 70 साल पुराना घराट आज भी पानी की धार से चल रहा—परिवार की विरासत और आजीविका का साधन

गोचर । पहाड़ों में घराट महज अनाज पीसने की चक्की नहीं रहे, बल्कि वे यहां की पारंपरिक जीवनशैली, प्रकृति आधारित तकनीक और आत्मनिर्भरता का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। आधुनिक मशीनों और बिजली से चलने वाली चक्कियों के दौर में जहां अधिकांश पारंपरिक घराट बंद हो चुके हैं, वहीं बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग के निकट गोचर से करीब तीन किलोमीटर आगे चटवापीपल स्थित उमा सदन में करीब 70 साल पुराना घराट आज भी पानी की धार से चल रहा है।

यह घराट अब केवल अनाज पीसने का साधन नहीं, बल्कि एक परिवार की विरासत, भावनाओं और आजीविका से जुड़ी कहानी बन चुका है।

‘घराट वालों की बहू’ से घराट की जिम्मेदारी तक

सरिता चौहान बताती हैं कि यह घराट उनके ससुर की निशानी है। शादी के बाद जब वह परिवार में आईं तो आसपास के लोग उन्हें ‘घराट वालों की बहू’ कहकर पुकारते थे। उस समय यह संबोधन उनके लिए सामान्य था, लेकिन धीरे-धीरे घराट और उससे जुड़ी पहचान उनके जीवन का अहम हिस्सा बन गई।

कुछ वर्ष पहले गांव तक सड़क पहुंचने के दौरान घराट तक पानी पहुंचाने वाली नहर बंद हो गई। पानी का प्रवाह रुकने से घराट भी बंद हो गया। लंबे समय तक पनचक्की के पाट शांत रहे और परिवार की यह पुरानी विरासत थम गई।

हालांकि, सरिता चौहान के मन में घराट को दोबारा चलाने की इच्छा बनी रही। उन्होंने पुरानी व्यवस्था को दुरुस्त कर इसे फिर से संचालित करने का निर्णय लिया।

ससुर की निशानी ने फिर पकड़ी रफ्तार

सरिता चौहान के लिए यह घराट केवल एक पुरानी मशीन नहीं है। यह उनके परिवार की पहचान और ससुर की यादों से जुड़ा हुआ है। इसी भावनात्मक जुड़ाव ने उन्हें घराट को दोबारा चलाने की प्रेरणा दी।

आज जब पानी की धार के साथ घराट के पाट घूमते हैं तो उन्हें लगता है कि परिवार की पुरानी विरासत फिर से जीवंत हो उठी है।

गेहूं से लेकर मडुवा और झंगोरा तक पीसता है घराट

इस घराट में गेहूं, मडुवा, झंगोरा समेत अन्य अनाज पीसे जाते हैं। पारंपरिक तरीके से पिसे आटे की मांग आज भी बनी हुई है। ऐसे में करीब सात दशक पुराना यह घराट परिवार के लिए आजीविका का एक महत्वपूर्ण साधन भी बन गया है।

दिक्कत आए तो रिटायर्ड फौजी संभालते हैं मोर्चा

घराट को चलाने के दौरान समय-समय पर तकनीकी दिक्कतें भी आती रहती हैं। सरिता चौहान बताती हैं कि जब घराट में कोई परेशानी आती है तो उनके जेठ, जो सेवानिवृत्त सैनिक हैं, उसे ठीक करने में जुट जाते हैं।

घराट की तकनीक और उसकी कार्यप्रणाली से परिचित होने के कारण वह छोटी-बड़ी दिक्कतों को दूर कर पनचक्की को दोबारा चलने लायक बना देते हैं।

प्रकृति की ताकत से चलती है पनचक्की

घराट की पूरी व्यवस्था पानी के बहाव पर निर्भर है। पानी की धार के दबाव से नीचे लगी संरचना घूमती है और उसके साथ घराट के पाट भी घूमने लगते हैं। पाटों के बीच डाला गया अनाज धीरे-धीरे पिसकर आटे में बदल जाता है।

इस प्रक्रिया में न बिजली की जरूरत पड़ती है और न ही किसी ईंधन की। प्रकृति की शक्ति से संचालित यह व्यवस्था आज भी परंपरागत और पर्यावरण के अनुकूल तकनीक का उदाहरण है।

विरासत को बचाए हुए है चटवापीपल का घराट

सात दशक पुराने इस घराट की खासियत यही है कि आधुनिकता के दौर में भी उसने अपनी उपयोगिता बनाए रखी है। पहाड़ों में जहां पारंपरिक घराट लगातार खत्म होते जा रहे हैं, वहीं चटवापीपल का यह घराट परिवार की मेहनत और लगाव के चलते आज भी चल रहा है।

सरिता चौहान के लिए यह घराट ससुर की निशानी भी है और परिवार की आजीविका का जरिया भी। पानी की कल-कल के बीच घूमते इसके पाट केवल अनाज नहीं पीस रहे, बल्कि पहाड़ की उस पुरानी परंपरा को भी आगे बढ़ा रहे हैं, जिसमें प्रकृति ऊर्जा थी, श्रम जीवन का आधार था और विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना जिम्मेदारी।

 


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