विश्व लार ग्रंथि कैंसर दिवस पर दून मेडिकल कॉलेज में जागरूकता कार्यक्रम—निःशुल्क परामर्श शिविर और पोस्टर प्रदर्शनी का आयोजन

4 अक्टूबर, देहरादून। विश्व लार ग्रंथि कैंसर दिवस के अवसर पर राजकीय दून मेडिकल कॉलेज चिकित्सालय, देहरादून के ऑन्कोलॉजी और ईएनटी विभाग की ओर से विशेष जागरूकता कार्यक्रम, निःशुल्क परामर्श शिविर और पोस्टर प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य आम जनता और मेडिकल छात्रों को इस दुर्लभ लेकिन महत्वपूर्ण कैंसर के प्रति जागरूक करना रहा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता ऑन्कोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. दौलत सिंह ने की। इस अवसर पर विशेषज्ञों ने लार ग्रंथि कैंसर के लक्षण, जोखिम कारक, जांच, उपचार और बचाव के उपायों की जानकारी दी।

दुर्लभ होने के कारण लोग नहीं देते ध्यान

प्रो. डॉ. दौलत सिंह ने बताया कि सिर और गर्दन के कुल कैंसरों में लार ग्रंथि कैंसर की हिस्सेदारी करीब 3 से 6 प्रतिशत है। विश्व में इसकी दर प्रति 10 लाख आबादी पर करीब 10 से 15 मामले बताई जाती है।

उन्होंने कहा कि दुर्लभ होने के कारण लोग इस बीमारी को गंभीरता से नहीं लेते। उनके अनुसार, ओपीडी में आने वाले करीब 70 प्रतिशत मरीज स्थानीय स्तर पर मम्प्स, सूजन या संक्रमण की दवा लेने के बाद छह महीने से एक साल के अंतराल में अस्पताल पहुंचते हैं। तब तक कई मामलों में बीमारी तीसरी या चौथी स्टेज तक पहुंच चुकी होती है।

लार ग्रंथियों की संरचना

प्रो. डॉ. दौलत सिंह ने बताया कि लार पाचन प्रक्रिया और दांतों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। मनुष्य के मुंह में प्रतिदिन करीब 1 से 1.5 लीटर लार बनती है। मुंह में तीन जोड़ी बड़ी लार ग्रंथियों के साथ करीब 600 से 1000 छोटी ग्रंथियां होती हैं।

प्रमुख लार ग्रंथियां

पैरोटिड ग्रंथि: यह कान के ठीक सामने स्थित सबसे बड़ी लार ग्रंथि है। इसका वजन करीब 25 ग्राम बताया गया। करीब 70 प्रतिशत ट्यूमर इसी ग्रंथि में बनते हैं। इसकी महत्वपूर्ण जटिलता यह है कि चेहरे के हाव-भाव को नियंत्रित करने वाली फेशियल नर्व इसी ग्रंथि के बीच से गुजरती है।

सबमैंडिबुलर ग्रंथि: यह जबड़े के नीचे स्थित दूसरी सबसे बड़ी लार ग्रंथि है।

सबलिंगुअल ग्रंथि: यह जीभ के नीचे स्थित प्रमुख लार ग्रंथियों में सबसे छोटी है।

माइनर सैलाइवरी ग्लैंड: ये छोटी-छोटी ग्रंथियां होंठ, तालू, गाल और गले में फैली होती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार तालू पर बनने वाले ट्यूमर में 50 प्रतिशत से अधिक घातक होने की संभावना रहती है।

20 से अधिक प्रकार के ट्यूमर

ऑन्कोलॉजी की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. पिंकी ने बताया कि लार ग्रंथि में 20 से अधिक प्रकार के ट्यूमर होते हैं। पैरोटिड में बनने वाली करीब 75 प्रतिशत गांठें बिनाइन यानी गैर-कैंसरकारी होती हैं।

इनमें सबसे आम प्लियोमॉर्फिक एडेनोमा, जिसे मिक्स्ड ट्यूमर भी कहा जाता है, है। यह धीरे-धीरे बढ़ता है, लेकिन लंबे समय तक छोड़े जाने पर 5 से 10 प्रतिशत मामलों में कैंसर में बदल सकता है। दूसरा आम बिनाइन ट्यूमर वारथिन ट्यूमर है, जिसका संबंध धूम्रपान से बताया गया है।

घातक ट्यूमर में म्यूकोएपिडर्मॉइड कार्सिनोमा सबसे आम बताया गया। यह बच्चों में होने वाला सबसे आम लार ग्रंथि कैंसर भी है। लो-ग्रेड मामलों में इसका उपचार केवल सर्जरी से संभव हो सकता है।

एडेनॉइड सिस्टिक कार्सिनोमा भी महत्वपूर्ण कैंसर है। यह धीरे बढ़ता है, लेकिन नसों के रास्ते फैल सकता है। उपचार के 10 से 15 साल बाद भी फेफड़ों में दोबारा बीमारी सामने आ सकती है, इसलिए ऐसे मरीजों के लंबे समय तक फॉलोअप की जरूरत बताई गई।

विशेषज्ञों के अनुसार सबलिंगुअल ग्रंथि में ट्यूमर कम बनते हैं, लेकिन इनमें करीब 80 प्रतिशत घातक हो सकते हैं।

क्या हैं जोखिम कारक?

विशेषज्ञों के अनुसार इस कैंसर का कोई एक निश्चित कारण नहीं है, लेकिन कुछ जोखिम कारक पहचाने गए हैं—

  • बचपन में सिर और गर्दन के क्षेत्र में रेडिएशन थेरेपी।
  • 50 से 65 वर्ष की उम्र।
  • रबर फैक्ट्री, एस्बेस्टस, निकेल, लकड़ी के बुरादे और सिलिका धूल के संपर्क में काम करना।
  • धूम्रपान और तंबाकू का सेवन।
  • कुछ वायरस को लेकर शोध जारी है।

यह बीमारी छूने से नहीं फैलती।

इन सात लक्षणों को नजरअंदाज न करें

ईएनटी विभाग के डॉ. नितिन शर्मा ने लार ग्रंथि कैंसर के सात प्रमुख चेतावनी संकेत बताए। उन्होंने कहा कि इन लक्षणों के सामने आने पर चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए—

  1. कान के सामने, गाल, जबड़े के नीचे या गर्दन में तीन सप्ताह से अधिक समय तक रहने वाली कठोर और दर्द रहित गांठ, जो हिलती-डुलती न हो।
  2. चेहरे के एक तरफ कमजोरी, मुंह का टेढ़ा होना या आंख बंद न कर पाना।
  3. चेहरे के किसी हिस्से में सुन्नपन, झुनझुनी या सुई चुभने जैसा एहसास।
  4. बिना किसी स्पष्ट कारण के कान में लगातार दर्द।
  5. मुंह पूरा न खुल पाना यानी ट्रिस्मस।
  6. खाना निगलने में कठिनाई।
  7. मुंह के अंदर तालू पर लगातार सूजन या घाव।

जांच की प्रक्रिया क्या है?

डॉ. पिंकी ने बताया कि सबसे पहले चिकित्सक गांठ की क्लिनिकल जांच करते हैं। इसके बाद हाई-रेजोल्यूशन अल्ट्रासाउंड और USG गाइडेड FNAC किया जाता है।

पैरोटिड ट्यूमर के लिए MRI को महत्वपूर्ण जांच बताया गया, जिससे नसों में फैलाव और डीप लोब की स्थिति का पता चलता है। हड्डी में फैलाव देखने के लिए CT स्कैन और कैंसर के फैलाव का आकलन करने के लिए PET-CT किया जाता है।

अंतिम और सबसे पक्का निदान ऑपरेशन के बाद निकाली गई गांठ की हिस्टोपैथोलॉजी जांच से होता है। इसमें मार्जिन, नसों में कैंसर की मौजूदगी और लिम्फ नोड में कैंसर आदि की जांच की जाती है।

सर्जरी है मुख्य उपचार

प्रो. डॉ. दौलत सिंह ने बताया कि लार ग्रंथि कैंसर का मुख्य और सबसे प्रभावी उपचार सर्जरी है। उनके अनुसार करीब 90 प्रतिशत मामलों में सर्जरी से उपचार संभव है।

पैरोटिड ग्रंथि की सर्जरी को पैरोटिडेक्टॉमी कहा जाता है। इसमें फेशियल नर्व को बचाना महत्वपूर्ण होता है। दून हॉस्पिटल में इंट्राऑपरेटिव नर्व मॉनिटर की मदद से नर्व को बचाते हुए पूरी ग्रंथि या प्रभावित हिस्से को निकाला जाता है।

सबमैंडिबुलर ग्रंथि की सर्जरी में पूरी ग्रंथि के साथ लिंगुअल नर्व और हाइपोग्लॉसल नर्व को बचाने का प्रयास किया जाता है।

यदि कैंसर गर्दन की गिल्टियों तक फैल गया हो तो नेक डिसेक्शन की जरूरत पड़ सकती है। बड़े ट्यूमर में चेहरे या जबड़े का हिस्सा निकालने की स्थिति में प्लास्टिक सर्जरी द्वारा फ्री फ्लैप तकनीक से पुनर्निर्माण किया जाता है।

किन मामलों में रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी की जरूरत?

सर्जरी के बाद हाई-ग्रेड ट्यूमर, T3-T4 स्टेज, पॉजिटिव मार्जिन, नसों या लिम्फ नोड में कैंसर होने पर IMRT तकनीक से रेडियोथेरेपी दी जाती है। यह उपचार 30 से 33 दिनों तक चलने की जानकारी दी गई।

विशेषज्ञों के अनुसार लार ग्रंथि कैंसर में कीमोथेरेपी की भूमिका सीमित है। हालांकि चौथी स्टेज या फेफड़ों तक फैल चुके मामलों में कार्बोप्लाटिन-पैक्लिटैक्सल और नई दवाओं जैसे लेनवेटिनिब तथा एंड्रोजन ब्लॉकर्स पर ट्रायल चल रहे हैं।

सर्जरी के बाद पुनर्वास भी जरूरी

डॉ. शशांक जोशी, डॉ. विजय, डॉ. इशानी और डॉ. आशुतोष की टीम ने बताया कि सर्जरी के बाद कुछ अस्थायी समस्याएं हो सकती हैं। इनमें Frey’s Syndrome, चेहरे पर अस्थायी कमजोरी और मुंह का सूखना शामिल है।

चेहरे की अस्थायी कमजोरी तीन से छह महीने में फिजियोथेरेपी के जरिए ठीक हो सकती है। मुंह सूखने की स्थिति में कृत्रिम लार और अधिक पानी पीने की सलाह दी जाती है।

दून हॉस्पिटल में मरीजों के लिए फिजियोथेरेपी और स्पीच थेरेपी की सुविधा उपलब्ध होने की जानकारी दी गई। कृतिका मेहरा और नेहा शर्मा मरीजों की काउंसलिंग, डाइट प्लान और फॉलोअप रिकॉर्ड का काम संभालती हैं।

समय पर पहचान से बेहतर परिणाम

विशेषज्ञों के अनुसार पहली स्टेज में कैंसर की पहचान होने पर पांच साल की जीवित रहने की दर 90 से 95 प्रतिशत तक बताई गई है। दूसरी स्टेज में यह करीब 80 प्रतिशत, तीसरी में 60 प्रतिशत और चौथी स्टेज में 30 से 40 प्रतिशत बताई गई। एडेनॉइड सिस्टिक कार्सिनोमा के मरीजों के लिए 15 साल तक फॉलोअप की जरूरत बताई गई।

बचाव के लिए क्या करें?

विशेषज्ञों ने तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट और गुटखा पूरी तरह छोड़ने की सलाह दी। फैक्ट्री या धूल वाले कार्यस्थल पर N95 मास्क पहनने, फल और सब्जियों से युक्त संतुलित आहार लेने तथा नियमित रूप से स्वयं जांच करने की सलाह दी गई।

आईने के सामने कान के आगे और जबड़े के नीचे उंगलियों से जांच करने तथा दो सप्ताह से अधिक समय तक रहने वाली किसी भी गांठ को नजरअंदाज न करने का संदेश दिया गया।

दून हॉस्पिटल में निःशुल्क जांच शिविर

राजकीय दून मेडिकल कॉलेज में हर शनिवार हेड-नेक कैंसर ओपीडी, कमरा नंबर 12 में संचालित होने की जानकारी दी गई। 4 अक्टूबर को सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक ओपीडी परिसर में निःशुल्क जांच शिविर और पोस्टर प्रदर्शनी आयोजित की गई, जिसमें 50 से अधिक मरीजों की जांच की गई।

अंत में प्रो. डॉ. दौलत सिंह ने कहा, “लार ग्रंथि कैंसर दुर्लभ है पर उपेक्षा घातक है। डरें नहीं, जागरूक बनें। समय पर जांच ही जीवन बचाती है।”

विशेषज्ञ टीम

  • मुख्य लेखक: प्रो. डॉ. दौलत सिंह, MD, विभागाध्यक्ष, ऑन्कोलॉजी विभाग, राजकीय दून मेडिकल कॉलेज चिकित्सालय, देहरादून
  • सह-लेखक: डॉ. पिंकी, असिस्टेंट प्रोफेसर, ऑन्कोलॉजी विभाग
  • सह-लेखक: डॉ. नितिन शर्मा, ईएनटी विभाग
  • सहयोगी टीम: डॉ. शशांक जोशी, डॉ. विजय, डॉ. इशानी, डॉ. आशुतोष, कृतिका मेहरा, नेहा शर्मा

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