गढ़वाल की लोक संस्कृति में पांडव नृत्य का विशेष स्थान, महाभारत काल से जुड़ा है अनुष्ठान

देहरादून। उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र की समृद्ध लोक संस्कृति में पांडव (पंडौं) नृत्य का विशेष स्थान है। यह केवल एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि महाभारत काल, धार्मिक आस्था और लोक परंपराओं से जुड़ा एक जीवंत सांस्कृतिक अनुष्ठान है। मान्यता है कि महाभारत युद्ध से पहले और युद्ध के बाद पांडवों ने गढ़वाल में लंबा समय बिताया। लाखामंडल में दुर्योधन ने पांडवों और माता कुंती को जीवित जलाने के लिए लाक्षागृह का निर्माण कराया था।

महाभारत युद्ध के बाद महर्षि वेदव्यास के निर्देश पर पांडव पापों से मुक्ति के लिए केदारभूमि पहुंचे। मान्यता है कि उन्होंने केदारनाथ में भगवान शिव के महिष रूप की पूजा कर बाबा केदार की प्रतिष्ठा की। इसके बाद मध्यमहेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ और कल्पेश्वर में भी भगवान शिव की आराधना की। अंततः वे द्रौपदी के साथ बदरीनाथ होते हुए स्वर्गारोहिणी की ओर प्रस्थान कर गए, जहां केवल युधिष्ठिर ही सशरीर स्वर्ग पहुंचे।

लोकदेवता के रूप में होती है पांडवों की पूजा

गढ़वाल में पांडवों के प्रति इसी आस्था के कारण उन्हें लोकदेवता माना जाता है। प्रत्येक वर्ष नवंबर-दिसंबर में, जब खेती का कार्य पूरा हो जाता है, गांवों में पांडव नृत्य का आयोजन होता है। सबसे भव्य आयोजन रुद्रप्रयाग जिले के तल्ला नागपुर क्षेत्र में होता है, जबकि जौनसार-बावर क्षेत्र में भी यह महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है।

प्रवासी और बेटियां भी लौटती हैं गांव

पांडव नृत्य केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक मिलन का भी अवसर होता है। इस दौरान बड़ी संख्या में प्रवासी अपने गांव लौटते हैं और विवाहित बेटियां भी मायके पहुंचती हैं। लोग गांव की खुशहाली, अच्छी फसल और समृद्धि की कामना के साथ इस आयोजन में भाग लेते हैं।

ढोल-दमाऊ की थाप पर जीवंत होती हैं महाभारत की कथाएं

पांडव नृत्य गांव के पांडव चौक में आयोजित किया जाता है। ढोल-दमाऊ की विशेष ताल पर पांडवों की भूमिका निभाने वाले ‘पश्वा’ अवतरित होने की मान्यता है। युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी सहित कुल 13 पश्वा इस अनुष्ठान का हिस्सा होते हैं।

यह आयोजन नृत्य, संगीत और नाट्य का अद्भुत संगम है, जिसमें महाभारत की घटनाओं, पांडवों के जीवन, युद्ध कौशल, कृषि, लोकजीवन और सामाजिक मूल्यों का सजीव मंचन किया जाता है। इसकी विशेषता यह भी है कि इसमें किसी लिखित पटकथा का प्रयोग नहीं होता और पूरा संचालन पारंपरिक ढोली तथा लोककथाओं के जानकारों द्वारा किया जाता है।

लाखामंडल से जुड़ी हैं पांडवों की ऐतिहासिक स्मृतियां

यमुना घाटी स्थित लाखामंडल को महाभारत काल की महत्वपूर्ण स्थली माना जाता है। मान्यता है कि यहीं लाक्षागृह का निर्माण किया गया था और यहां मौजूद प्राचीन गुफाओं में पांडवों ने कुछ समय व्यतीत किया। आज भी इस क्षेत्र में प्रतिवर्ष पांडव लीला और पांडव नृत्य का आयोजन किया जाता है।


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