ऋषिकेश। भारत के 14वें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ अपनी धर्मपत्नी सुदेश धनखड़ के साथ ऋषिकेश स्थित परमार्थ निकेतन पहुंचे। मां गंगा के पावन तट पर स्थित परमार्थ निकेतन के आध्यात्मिक प्रांगण में उनका वैदिक परंपरा के अनुरूप भव्य अभिनंदन किया गया। परमार्थ गुरुकुल के ऋषिकुमारों और आचार्यों ने शंखनाद, पुष्पवर्षा और वेदमंत्रों के उच्चारण के साथ उनका स्वागत किया।
स्वामी चिदानंद सरस्वती और साध्वी भगवती सरस्वती से की भेंट
परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानंद सरस्वती महाराज एवं साध्वी भगवती सरस्वती ने जगदीप धनखड़ और सुदेश धनखड़ का आत्मीय स्वागत किया। इस दौरान राष्ट्र, समाज, संस्कृति, पर्यावरण, शिक्षा, युवा पीढ़ी और भारत की आध्यात्मिक विरासत सहित विभिन्न विषयों पर सार्थक संवाद हुआ।
स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि भारत की शक्ति केवल भौतिक प्रगति में नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, करुणा, सेवा, साधना और प्रकृति के प्रति श्रद्धा में भी निहित है। उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा उसकी संस्कृति में और शक्ति उसकी युवा पीढ़ी में है।
उन्होंने कहा कि जब युवा अपनी जड़ों से जुड़े रहकर आधुनिक ज्ञान के साथ भारतीय संस्कारों को आत्मसात करेंगे और राष्ट्रसेवा को जीवन का उद्देश्य बनाएंगे, तभी विकसित भारत का संकल्प साकार होगा।
सेवा, पर्यावरण और गंगा संरक्षण पर जोर
स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि परमार्थ निकेतन की गतिविधियों में गंगा स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, वृक्षारोपण, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य, योग, भारतीय संस्कृति और वैश्विक शांति जैसे विषय प्रमुख हैं।
उन्होंने कहा कि भारत विश्व को आर्थिक विकास के साथ मानवता, पर्यावरणीय संतुलन, योग, शांति और सह-अस्तित्व की जीवनदृष्टि भी दे रहा है।
धनखड़ ने की परमार्थ निकेतन के कार्यों की सराहना
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि भारत की पहचान उसकी समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत से है। मां गंगा के पावन तट पर आकर उन्हें शांति और ऊर्जा की अनुभूति हुई।
उन्होंने परमार्थ निकेतन द्वारा सेवा, संस्कार, पर्यावरण संरक्षण, गंगा स्वच्छता और मानव कल्याण के लिए किए जा रहे कार्यों की सराहना की। उन्होंने परमार्थ गुरुकुल के ऋषिकुमारों को दी जा रही वैदिक शिक्षा और भारतीय संस्कारों के संरक्षण को भी प्रेरणादायी बताया।
धनखड़ ने कहा कि आधुनिक ज्ञान के साथ युवा पीढ़ी का अपनी संस्कृति, परंपराओं और नैतिक मूल्यों से जुड़ाव आवश्यक है। यही देश के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला है।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना का संदेश
साध्वी भगवती सरस्वती ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की व्यापक दृष्टि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत की आध्यात्मिक विरासत किसी एक वर्ग, क्षेत्र या राष्ट्र तक सीमित नहीं है। इसका मूल संदेश ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की वैश्विक चेतना से जुड़ा है।
उन्होंने कहा कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा मानवता को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देती है।
भगवान शिव की प्रतिमा और रुद्राक्ष का पौधा भेंट
इस अवसर पर स्वामी चिदानंद सरस्वती ने जगदीप धनखड़ को भगवान शिव की दिव्य प्रतिमा, रुद्राक्ष का पौधा और सद्साहित्य भेंट कर उनका अभिनंदन किया।
यह मुलाकात संविधान की गरिमा, भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रसेवा के मूल्यों के संगम के रूप में सामने आई।
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