चमोली। ग्राम पंचायत गंगाड़ निवासी शंकर दास उर्फ बब्लू दास की पत्नी आमिना की प्रसव के दौरान मौत ने दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों की स्वास्थ्य एवं आपातकालीन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया गया कि आमिना गर्भवती थीं और प्रसव पीड़ा के दौरान उन्हें बेहतर उपचार की आवश्यकता थी। इसी बीच प्रतिकूल मौसम, दुर्गम रास्तों और समय पर समुचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध न हो पाने की स्थिति में आमिना और उनके नवजात बच्चे की मौत हो गई।
घटना ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि दुर्गम क्षेत्रों में गंभीर मरीजों, विशेषकर गर्भवती महिलाओं के लिए आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
खराब मौसम के कारण हेली सेवा भी नहीं हो सकी
बताया गया कि आमिना को बेहतर उपचार के लिए एयरलिफ्ट कर देहरादून भेजने की बात सामने आई थी, लेकिन खराब मौसम के कारण हेली सेवा उपलब्ध नहीं हो सकी। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि हेली सेवा संभव न होने की स्थिति में मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्या थी और उसे कितनी तेजी से सक्रिय किया गया।
प्रसव जैसी आपात स्थिति मौसम या भौगोलिक परिस्थितियों का इंतजार नहीं करती। ऐसे में दुर्गम क्षेत्रों के लिए वैकल्पिक परिवहन और आपातकालीन रेफरल व्यवस्था का मजबूत होना बेहद जरूरी है।
निष्पक्ष जांच की उठी मांग
इस घटना को लेकर पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग उठ रही है। जांच में यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि आमिना की तबीयत कब गंभीर हुई, उन्हें प्रारंभिक उपचार कहां मिला, रेफरल की जरूरत कब महसूस हुई और एयरलिफ्ट के लिए कब संपर्क किया गया।
इसके साथ ही खराब मौसम के कारण हेली सेवा उपलब्ध न होने की आधिकारिक स्थिति, मौसम रिपोर्ट और मरीज को सड़क मार्ग से अस्पताल पहुंचाने के लिए किए गए प्रयासों की भी जानकारी सामने आनी चाहिए।
जांच का उद्देश्य किसी व्यक्ति या विभाग को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि यदि किसी स्तर पर व्यवस्था संबंधी कमी रही हो तो उसे पहचानकर भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना होना चाहिए।
पहाड़ में स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत
दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य व्यवस्था केवल अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों तक सीमित नहीं हो सकती। समय पर एंबुलेंस, सड़क संपर्क, डॉक्टर, दवाइयां, रेफरल व्यवस्था और आपातकालीन परिवहन भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
विशेषज्ञ व्यवस्था के स्तर पर कुछ प्रमुख कदमों की जरूरत बताई जा रही है—
- दुर्गम क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्रों को आवश्यक संसाधनों से मजबूत करना।
- गर्भवती महिलाओं की हाई-रिस्क स्थिति की पहले से पहचान करना।
- गंभीर मामलों को प्रसव से पहले सुरक्षित स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाने की व्यवस्था करना।
- 24 घंटे आपातकालीन परिवहन व्यवस्था विकसित करना।
- खराब मौसम में वैकल्पिक चिकित्सा निकासी योजना तैयार रखना।
- स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त चिकित्सकीय एवं प्रशिक्षित स्टाफ उपलब्ध कराना।
- गांव स्तर पर गर्भवती महिलाओं की नियमित निगरानी सुनिश्चित करना।
- संवेदनशील एवं क्षतिग्रस्त मार्गों का समयबद्ध सुधार करना।
सिर्फ हेली सेवा पर निर्भरता पर्याप्त नहीं
दुर्गम क्षेत्रों में हेली सेवा आपातकालीन परिस्थितियों में महत्वपूर्ण विकल्प जरूर है, लेकिन इसे स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। मौसम खराब होने की स्थिति में सड़क मार्ग, स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र और वैकल्पिक चिकित्सा निकासी व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए।
आमिना की मौत ने इसी व्यवस्था की मजबूती पर सवाल खड़ा किया है। एक परिवार ने मां और नवजात दोनों को खो दिया। अब जरूरी है कि घटना की वास्तविक परिस्थितियां सामने आएं और यदि किसी स्तर पर चूक हुई है तो उसे दूर किया जाए।
सवाल व्यवस्था से है
आमिना की मौत पर सवाल उठाना किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ आरोप नहीं, बल्कि दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य अधिकार और समान चिकित्सा सुविधा को लेकर चिंता है।
क्या किसी दुर्गम गांव में रहने वाली गर्भवती महिला को समय पर सुरक्षित प्रसव की सुविधा मिल सकती है? क्या खराब मौसम में वैकल्पिक आपातकालीन व्यवस्था सक्रिय करने की स्पष्ट प्रणाली मौजूद है? और क्या भविष्य में ऐसी स्थिति से निपटने के लिए कोई ठोस प्रोटोकॉल तैयार किया जाएगा?
इन सवालों के जवाब जरूरी हैं, ताकि आमिना की मौत केवल एक खबर बनकर न रह जाए, बल्कि इससे सीख लेकर ऐसी व्यवस्था तैयार हो सके जो भविष्य में किसी दूसरी मां और उसके नवजात की जान बचा सके।
आमिना और उनके नवजात शिशु को विनम्र श्रद्धांजलि।
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