चमोली: मां नंदा देवी की राजजात यात्रा पहुंची अंतिम और सबसे कठिन पड़ाव पर—शीलासमुद्र और होमकुंड की ओर बढ़ रही डोली

चमोली। मां नंदा देवी (राज राजेश्वरी) की विश्वप्रसिद्ध बड़ी जात यानी राजजात यात्रा वर्ष 2026 में अपने अंतिम और सबसे कठिन पड़ाव पर पहुंच चुकी है। मां नंदा देवी की यह यात्रा उत्तराखंड की धार्मिक आस्था, लोक संस्कृति और परंपराओं का प्रमुख प्रतीक मानी जाती है। हर 12 वर्ष में आयोजित होने वाली इस पैदल यात्रा में उत्तराखंड के साथ देश के अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु शामिल होते हैं।

गढ़वाल और कुमाऊं की अधिष्ठात्री देवी हैं मां नंदा

मां नंदा देवी को गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां नंदा को भगवान शिव की अर्धांगिनी पार्वती का रूप माना जाता है। उत्तराखंड के लोग उन्हें अपने परिवार की बेटी यानी ध्याण के रूप में पूजते हैं।

मां नंदा के उत्सव के दौरान उन्हें बेटी की तरह विदाई देने की परंपरा निभाई जाती है। यह विदाई भावुक क्षणों से भरी होती है और देवताओं तथा इंसानों के बीच प्रेम और आत्मीयता का प्रतीक मानी जाती है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मां नंदा अपने भक्तों के दुख दूर कर उनकी रक्षा करती हैं और उन्हें आशीर्वाद प्रदान करती हैं।

हिमालय का महाकुंभ कहलाती है राजजात यात्रा

मां नंदा राजजात उत्तराखंड की प्रसिद्ध आध्यात्मिक पैदल यात्राओं में शामिल है। इसमें श्रद्धालु लंबी और कठिन यात्रा कर मां नंदा के प्रति अपनी आस्था और भावनात्मक जुड़ाव प्रकट करते हैं। इस यात्रा को हिमालय का महाकुंभ भी कहा जाता है।

शीलासमुद्र और होमकुंड की ओर बढ़ रही यात्रा

20 सितंबर को यात्रा अपने अंतिम पड़ावों शीलासमुद्र और होमकुंड की ओर बढ़ रही है। समुद्र तल से 14,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित इस उच्च हिमालयी क्षेत्र में मां नंदा की डोली के स्वागत को लेकर भक्तिमय वातावरण बना हुआ है।

होमकुंड में विशेष पूजा-अर्चना के बाद चार सींगों वाले पवित्र चौसिंग्या खाडू यानी मेंढे को नम आंखों से कैलाश की ओर अकेले विदा किया जाएगा। यह मां नंदा की विदाई का प्रतीकात्मक और भावुक क्षण होता है।

कठिन परिस्थितियों के बीच सुरक्षा के इंतजाम

अत्यधिक ऊंचाई के कारण इस क्षेत्र में बर्फ जमी रहती है और ऑक्सीजन की कमी भी रहती है। श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए चमोली प्रशासन, एसडीआरएफ और स्वास्थ्य विभाग की टीमें विभिन्न स्थानों पर तैनात हैं।

विधि-विधान से पूजा के बाद होगा यात्रा का समापन

होमकुंड में चौसिंग्या खाडू की अंतिम विदाई के बाद मां नंदा की डोली के साथ श्रद्धालु वापस अपने सिद्धपीठ की ओर लौटेंगे। वहां विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद यात्रा का समापन किया जाएगा।

मां नंदा की बड़ी जात केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, परंपराओं और बेटी की मायके से ससुराल विदाई की भावुक परंपरा को दर्शाने वाला एक महत्वपूर्ण आयोजन है।

रिपोर्ट: पूजा बरमोला गैरसैन


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