‘आपदा को प्राकृतिक घटना कहकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता’—NDMA के पूर्व विभागाध्यक्ष राजेंद्र सिंह ने दिए अहम सुझाव

हरादून। मध्य हिमालयी राज्य उत्तराखंड में आपदाओं को केवल प्राकृतिक घटनाओं का परिणाम मानकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। प्राकृतिक घटनाओं से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए उनके जोखिम और संवेदनशीलता को समझना तथा समय रहते प्रभावी कदम उठाना जरूरी है। इसके लिए जियोलॉजी, ज्योग्राफी और क्लाइमेट जैसे तीन प्रमुख पहलुओं का आकलन आवश्यक है। मानवीय हस्तक्षेप और अव्यवस्थित निर्माण जैसी गतिविधियां प्राकृतिक घटनाओं को आपदा में बदल सकती हैं।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के पूर्व विभागाध्यक्ष राजेंद्र सिंह ने सोमवार को दैनिक जागरण की ओर से आयोजित ‘उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन’ विषयक विमर्श में यह बात कही। उन्होंने कहा कि आपदा जोखिम की जानकारी को नियोजन का आधार बनाया जाना चाहिए। साथ ही आपदा प्रबंधन में समुदाय की सक्रिय भागीदारी बढ़ाने और केवल प्रतिक्रिया देने के बजाय आपदा न्यूनीकरण पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।

प्राकृतिक घटनाओं को आपदा बनने से रोकने पर जोर

राजेंद्र सिंह ने कहा कि अतिवृष्टि, बादल फटना और भूकंप जैसी प्राकृतिक घटनाओं को रोका नहीं जा सकता, लेकिन इनके कारण होने वाली क्षति को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए यह देखना जरूरी है कि संवेदनशील ढलानों पर अतिक्रमण, क्षमता से अधिक निर्माण या अन्य ऐसे अवरोध तो नहीं हैं, जो प्राकृतिक घटनाओं के दौरान नुकसान को बढ़ा सकते हैं।

उन्होंने कहा कि समय रहते जोखिम की पहचान कर प्रभावी कदम उठाए जाएं तो प्राकृतिक घटनाओं के आपदा में बदलने की संभावना को कम किया जा सकता है।

निर्माण से पहले हो जोखिम का आकलन

उन्होंने कहा कि किसी भी ढलान पर निर्माण करने से पहले उसका भूगर्भीय अध्ययन किया जाना चाहिए। सड़क, पुल, सुरंग, हाइड्रो प्रोजेक्ट और टाउनशिप जैसी परियोजनाओं को केवल इंजीनियरिंग के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं है। इनके साथ जोखिम का आकलन भी जरूरी है।

वर्षा का पैटर्न, क्षेत्र की संवेदनशीलता, भूमि की वहन क्षमता और आपदा की स्थिति में संभावित न्यूनीकरण उपायों को परियोजना की योजना में शामिल किया जाना चाहिए।

रिस्क एटलस का नियोजन में हो इस्तेमाल

राजेंद्र सिंह ने बताया कि उत्तराखंड के पास आपदा जोखिम से संबंधित रिस्क एटलस उपलब्ध है, जिसमें संवेदनशील क्षेत्रों और हॉटस्पॉट की जानकारी दी गई है। उन्होंने कहा कि यह जानकारी केवल सरकारी फाइलों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि हर विकास योजना और निर्माण परियोजना में इसका इस्तेमाल होना चाहिए।

किसी भी निर्माण से पहले यह देखा जाना चाहिए कि क्षेत्र में मल्टी-हैजर्ड और क्लाइमेट रिस्क कितना है तथा आपात स्थिति से निपटने के लिए क्या योजना तैयार है।

युवा और महिलाएं भी बनें आपदा प्रबंधन का हिस्सा

उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। आपदा के शुरुआती 30 मिनट बेहद महत्वपूर्ण होते हैं और उस समय स्थानीय लोग ही सबसे पहले राहत एवं बचाव के लिए पहुंचते हैं।

इसलिए युवाओं, महिला समूहों, टूरिस्ट गाइड, पुरोहितों और स्थानीय स्वयंसेवकों को आपदा प्रबंधन की जानकारी देकर तैयार किया जाना चाहिए। उन्होंने आपदा मित्र योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक गांव में प्रशिक्षित लोगों की टीम और स्थानीय स्तर पर स्पष्ट कम्युनिटी प्रोटोकाल होना चाहिए।

पहले से तैयारी पर देना होगा जोर

राजेंद्र सिंह ने कहा कि अब आपदा प्रबंधन को केवल प्रतिक्रिया तक सीमित रखने के बजाय रेजिलिएंस की दिशा में आगे बढ़ना होगा। उन्होंने चक्रवात प्रबंधन का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले तटीय क्षेत्रों में चक्रवात से बड़ी संख्या में जानें जाती थीं, लेकिन वर्ष 2005 में एनडीएमए और वर्ष 2007 में एनडीआरएफ के गठन के बाद तैयारियों में सुधार हुआ और आज चक्रवात के दौरान मृत्यु दर को काफी कम किया जा चुका है।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में भी यदि आपदा न्यूनीकरण के लिए पहले से तैयारी रखी जाए तो इसके सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।

वैज्ञानिक संस्थानों से बेहतर समन्वय जरूरी

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन के लिए बेहतर ढांचा मौजूद है और यूएसडीएमए नोडल एजेंसी के रूप में कार्य कर रहा है। प्रत्येक जिले के पास अपना आपदा प्रबंधन प्लान भी है। जरूरत है कि इन योजनाओं को गंभीरता से लागू किया जाए।

राज्य में कार्यरत विभिन्न विभागों और एजेंसियों को वैज्ञानिक संस्थानों के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करना चाहिए। इससे जोखिम न्यूनीकरण के प्रभावी उपाय तैयार किए जा सकेंगे। उन्होंने इंसीडेंट रिस्पांस सिस्टम को भी लगातार सक्रिय रखने पर जोर दिया।

ये सुझाव भी दिए

  • अर्ली वार्निंग के साथ अर्ली एक्शन की व्यवस्था सुनिश्चित हो।
  • किसी भी योजना या निर्माण से पहले जोखिम का आकलन किया जाए।
  • चारधाम यात्रा मार्ग सहित पर्वतीय क्षेत्रों में आपदा से बचाव के लिए शेल्टर विकसित किए जाएं।
  • आपदा प्रबंधन के लिए बजट की कमी नहीं है, इसलिए राज्य सरकार को फुलप्रूफ प्रस्ताव तैयार कर केंद्र को भेजने चाहिए।

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